पन्ना जिले के शाहनगर क्षेत्र में स्थित भड़रा बांध एक बार फिर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही के आरोपों के केंद्र में है। मानसून के आगमन की आहट के साथ ही, इस बांध की मरम्मत को लेकर हो रहे कार्यों ने स्थानीय किसानों के बीच भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। गुरुवार की शाम, जब बड़ी संख्या में स्थानीय किसान बांध स्थल पर पहुंचे, तो उन्होंने वहां चल रहे मरम्मत कार्य की गुणवत्ता देखकर अपना आपा खो दिया। यह बांध क्षेत्र के हजारों किसानों के लिए जीवनरेखा के समान है, लेकिन मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो यह बांध आने वाली पहली बारिश के साथ ही संकट का सबब बन सकता है।
गुणवत्ता से समझौता: प्रशासनिक मिलीभगत का आरोप
किसानों का स्पष्ट आरोप है कि भड़रा बांध पर लाखों रुपए का सरकारी बजट खर्च किया जा रहा है, लेकिन मरम्मत के नाम पर केवल खानापूर्ति की जा रही है। किसान अरुण पाल सिंह ने मीडिया के समक्ष विस्तार से अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि बांध की मजबूती के लिए तकनीकी मानकों का पालन करना अनिवार्य है। मानकों के अनुसार, बांध की दीवार को सुदृढ़ करने के लिए बाहर से गुणवत्तायुक्त और उपजाऊ काली मिट्टी लाई जानी चाहिए थी, जो जल धारण क्षमता को बढ़ाने और संरचना को स्थिरता देने में सक्षम हो।
इसके विपरीत, ठेकेदार और संबंधित विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से बांध के अंदरूनी हिस्सों से ही घटिया किस्म की मिट्टी निकालकर पुन: उपयोग में लाई जा रही है। किसानों का मानना है कि यह मिट्टी बांध की मजबूती के लिए पूरी तरह से अनुपयुक्त है। यह स्पष्ट रूप से सरकारी धन के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला प्रतीत होता है, जहाँ निर्माण की गुणवत्ता को दांव पर लगाकर निजी लाभ को प्राथमिकता दी जा रही है।
मानसून की दस्तक और बांध टूटने का खतरा
शाहनगर क्षेत्र के किसानों की सबसे बड़ी चिंता आगामी मानसून सत्र को लेकर है। किसानों ने चेतावनी दी है कि यदि इसी घटिया तरीके से मरम्मत कार्य जारी रहा, तो मानसून की पहली भारी बारिश ही बांध को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त होगी। बांध की वर्तमान संरचना पहले से ही कमजोर है और इस तरह की हल्की मरम्मत उसे और अधिक संवेदनशील बना रही है।
बांध में किसी भी प्रकार का रिसाव या दरार आना हजारों एकड़ कृषि भूमि को बंजर बना सकता है। यदि बारिश के दौरान बांध टूटता है, तो न केवल फसलों का नुकसान होगा, बल्कि निचले इलाकों में बसे गांवों के लिए भी बाढ़ जैसी विकट स्थिति उत्पन्न हो सकती है। किसानों का कहना है कि उनकी आजीविका सीधे तौर पर इस बांध पर निर्भर है, और उनकी मेहनत पर पानी फिरने का डर उन्हें हर दिन बेचैन कर रहा है।
वर्षों से जारी संघर्ष और प्रशासनिक उदासीनता
यह कोई पहली बार नहीं है जब भड़रा बांध की स्थिति को लेकर आवाज उठाई गई है। किसान मलखान सिंह और जुझार सिंह ने साझा किया कि पिछले चार वर्षों से वे लगातार इस संबंध में शिकायतें कर रहे हैं। उन्होंने सीएम हेल्पलाइन से लेकर जिले के आला अधिकारियों तक को ज्ञापन सौंपे हैं, लेकिन परिणाम हमेशा शून्य रहा है। हर साल बरसात से ठीक पहले मरम्मत के नाम पर सरकारी धन का आवंटन होता है, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी जस की तस बनी हुई है।
लगातार हो रही शिकायतों पर कोई ठोस कार्रवाई न होना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। अधिकारियों की यह उदासीनता किसानों के सब्र का बांध तोड़ने के लिए काफी है। पिछले चार वर्षों में शिकायतों के बाद भी समस्या का समाधान न होना प्रशासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अधिकारियों की चुप्पी और किसानों की हुंकार
इस मामले में जब जल संसाधन विभाग के एसडीओ सौर्य श्रीवास्तव से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, तो उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। अधिकारियों की यह चुप्पी किसानों के गुस्से को और अधिक भड़का रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि जिम्मेदार विभाग अपनी गलतियों को छिपाने के लिए मौन साधे हुए है।
अब किसानों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे जिला प्रशासन और जल संसाधन विभाग के उच्चाधिकारियों से इस पूरे निर्माण कार्य की तत्काल प्रभाव से उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कराने की मांग कर रहे हैं। यदि निष्पक्ष जांच कर मरम्मत कार्य की गुणवत्ता में तत्काल सुधार नहीं किया गया, तो वे बहुत जल्द बड़े स्तर पर उग्र आंदोलन, चक्काजाम और धरना-प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होंगे। किसानों की यह मांग न्यायोचित है, क्योंकि यह केवल उनकी खेती का ही नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व का प्रश्न है।
निष्कर्ष
पन्ना जिले के शाहनगर स्थित भड़रा बांध की स्थिति एक ऐसी चेतावनी है जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। सरकारी धन का उपयोग जनकल्याण के लिए होना चाहिए, न कि ठेकेदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की तिजोरियां भरने के लिए। प्रशासन को किसानों की इन मांगों को संवेदनशीलता के साथ लेना चाहिए और समय रहते सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना चाहिए।
बांध की मरम्मत का कार्य केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि एक सुरक्षात्मक जिम्मेदारी है। यदि प्रशासन अब भी नहीं जागता है, तो आने वाले समय में होने वाली किसी भी त्रासदी का जिम्मेदार सीधे तौर पर विभाग और संबंधित अधिकारी होंगे। किसानों का आक्रोश स्वाभाविक है, क्योंकि वे अपनी गाढ़ी कमाई और मेहनत को बर्बाद होते नहीं देख सकते। उच्च स्तरीय जांच और सख्त कार्रवाई ही अब इस संकट का एकमात्र समाधान है।
image source : https://www.bhaskar.com

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