राजनीतिक बदले की आग में झुलसता कांग्रेस नेता, आबादी भूमि पर बने मकानों को नोटिस!
पन्ना: राजनैतिक प्रतिशोध की भावना से प्रेरित होकर जिला प्रशासन द्वारा कांग्रेस नेता श्रीकांत दीक्षित और कई आदिवासी परिवारों को नोटिस जारी किए जाने से क्षेत्र में हड़कंप मच गया है। आरोप है कि ये नोटिस आबादी भूमि पर बने मकानों को अवैध घोषित कर जारी किए गए हैं, जिससे प्रशासन की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
मामला क्या है?
पिछले दिनों शहर के बायपास मार्ग पर स्थित कांग्रेस नेता श्रीकांत दीक्षित की निजी भूमि को शासकीय घोषित करने की कार्रवाई की गई थी। श्री दीक्षित ने इसके खिलाफ न्यायालय का रुख किया, जहां उन्हें त्वरित स्थगन आदेश मिला। आरोप है कि कलेक्टर के आदेश पर रोक लगने के बाद प्रशासन बदले की कार्रवाई पर उतर आया है।
अब, सुनहरा स्थित श्री दीक्षित के पुश्तैनी भवन को अवैध बताते हुए नोटिस जारी किया गया है। उनके साथ ही सुनहरा ग्राम पंचायत के सरपंच आशाराम गोंड, लम्पू प्रसाद, बालकिशन, श्रीमती सुमित्रा, रामदीन पाल, बेट पाल समेत 12 आदिवासी और गरीब परिवारों को भी नोटिस थमाए गए हैं, जिससे गांव में दहशत का माहौल है।
विवादित आराजी क्रमांक 691:
जानकारी के अनुसार, तहसीलदार पन्ना द्वारा सुनहरा ग्राम की जिस आराजी क्रमांक 691 में भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत नोटिस जारी किए गए हैं, वहां करीब 300 घर बने हुए हैं। लेकिन नोटिस सिर्फ 10-12 लोगों को ही मिले हैं, जिससे यह मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित प्रतीत होता है।
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने आनन-फानन में कार्रवाई की है। जबकि उक्त भूमि का पहले ही बटांकन हो चुका है, और श्रीकांत दीक्षित व अन्य आदिवासी आराजी क्रमांक 691/2 में काबिज हैं, जो आबादी भूमि के तौर पर दर्ज है। तहसीलदार पन्ना के नोटिस में संपूर्ण खसरा नंबर दिया गया है, जो आपत्तिजनक है।
सरपंच का आरोप:
गांव के सरपंच आशाराम गोंड ने बताया कि गांव में कई पीढ़ियों से लोग अपने घर बनाकर रह रहे हैं। पंचायत की आराजी क्रमांक 691/2 आबादी घोषित है और शेष आबादी क्षेत्र को आबादी घोषित करने का प्रस्ताव भी दिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में अधिकांश आदिवासी ग्रामीण निवास करते हैं, और यदि वे गांव की आबादी भूमि पर निवास नहीं करेंगे तो कहां जाएंगे? सरपंच ने इस कार्रवाई को बेहद गलत बताया है।
नेताओं की प्रतिक्रिया:
श्रीकांत दीक्षित, प्रदेश कांग्रेस कमेटी सदस्य: "प्रशासन मेरे खिलाफ जबरन कार्रवाई कर रहा है। पहले निजी भूमि को शासकीय किया गया, अब परेशान करने की मंशा से मेरे पुश्तैनी भवन को लेकर नोटिस दिया गया है। मेरे परिवार के अलावा गांव के आदिवासी ग्रामीणों को भी परेशान किया जा रहा है। जिला प्रशासन यह सब राजनैतिक दबाव के चलते कर रहा है। प्रशासन मेरा नुकसान करने के चक्कर में आम आदिवासियों को भी निशाना बना रहा है, जो पूरी तरह से गलत है।"
अखिलेश प्रजापति, तहसीलदार: "मुझे जानकारी नहीं है, नोटिस गए होंगे। यदि सबको नोटिस नहीं दिए गए तो कोई गलत नहीं है। कहां कौन अवैध रूप से रह रहा है, इसके बारे में मैं नहीं बता सकता, यहां सब जांच की बात है।"
मामले की गंभीरता को देखते हुए, प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठ रहे हैं। क्या यह वाकई में अवैध निर्माणों के खिलाफ अभियान है, या राजनीतिक द्वेष का परिणाम?

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