लगभग आधी से अधिक आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर है, फिर भी किसान वर्ग आज भी आर्थिक असुरक्षा, कर्ज़भार और बाजार की अनिश्चितता से जूझ रहा है। पिछले एक दशक में किसानों के विरोध-प्रदर्शन न केवल राज्यों के स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन चुके हैं। इन आंदोलनों के केंद्र में कुछ प्रमुख माँगें लगातार बनी हुई हैं — न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी, कृषि ऋण माफी, और ऐसे सुधार जिनसे खेती को स्थायी और लाभकारी बनाया जा सके।
किसानों का तर्क स्पष्ट है — जब इनपुट लागत (बीज, खाद, डीज़ल, श्रम) लगातार बढ़ रही है, तो बिना सुनिश्चित MSP के खेती घाटे का सौदा बन जाती है। दूसरी ओर, ऋण-माफी की माँग केवल वित्तीय राहत का मुद्दा नहीं बल्कि उस सामाजिक-आर्थिक चक्र से मुक्ति का प्रतीक है जिसमें किसान लगातार कर्ज़ में डूबते जा रहे हैं। सरकारी रिपोर्टों और स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार, देश के कई हिस्सों में किसान आत्महत्या की घटनाएँ इस संरचनात्मक असमानता का सबसे दर्दनाक परिणाम हैं।
कृषि सुधारों पर सरकार और विशेषज्ञों के बीच मतभेद भी गहरे हैं। एक ओर नीतिगत दृष्टि से कृषि बाजार को उदार बनाने की बात कही जाती है, वहीं किसानों का अनुभव बताता है कि बिना संरचनात्मक सुरक्षा और मूल्य गारंटी के कोई भी सुधार उन्हें और असुरक्षित बना सकता है। यही कारण है कि 2020–21 के कृषि कानूनों के विरोध के दौरान, एमएसपी और बाजार नियंत्रण की भूमिका पर व्यापक राष्ट्रीय बहस खड़ी हुई थी — जिसका प्रभाव आज भी कृषि नीति-निर्माण पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
भारतीय किसान आंदोलन की समयरेखा (2020-2025)
- सितंबर 2020: संसद द्वारा तीन कृषि कानून पारित।
- नवंबर 2021: 13 महीने के विरोध के बाद कानूनों को वापस लेने की घोषणा।
- फरवरी 2024: शंभू बॉर्डर पर नए सिरे से विरोध प्रदर्शन (MSP गारंटी की मांग)।
2020-21 का ऐतिहासिक आंदोलन: 2020 के कृषि कानूनों के खिलाफ भारतीय किसानों का विरोध प्रदर्शन मानव इतिहास के सबसे बड़े शांतिपूर्ण आंदोलनों में से एक था। सितंबर 2020 में संसद द्वारा पारित तीन कृषि कानून - किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक, किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा विधेयक, और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक - के विरुद्ध किसान संगठनों ने व्यापक विरोध शुरू किया।
मुख्यतः पंजाब और हरियाणा के किसानों ने "दिल्ली चलो" अभियान के तहत राष्ट्रीय राजधानी की ओर मार्च किया। 13 महीने तक चले इस आंदोलन के परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नवंबर 2021 में कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी।
2024-25 का नवीन आंदोलन: 13 फरवरी 2024 को पंजाब और हरियाणा के किसानों ने फिर से विरोध प्रदर्शन शुरू किया, मुख्यतः शंभू बॉर्डर पर केंद्रित। यह आंदोलन इस बात का प्रमाण है कि 2021 में सरकार द्वारा किए गए वादे अभी तक पूरे नहीं हुए हैं।
किसान आंदोलन 2024-25: मुख्य माँगें
1. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी
किसानों की सबसे प्रमुख मांग सभी फसलों के लिए MSP की कानूनी गारंटी है। वर्तमान में सरकार 22 फसलों के लिए MSP घोषित करती है, लेकिन वास्तविक खरीद मुख्यतः धान और गेहूं तक सीमित है।
किसान मांग कर रहे हैं कि MSP का निर्धारण C2+50% फॉर्मूले पर हो। इसमें भुगतान किए गए खर्च, पारिवारिक श्रम का मूल्य, भूमि का किराया और स्थिर पूंजी पर ब्याज शामिल है। वर्तमान में सरकार A2+FL (लागत + पारिवारिक श्रम) का उपयोग करती है।
सरकार की स्थिति: कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने संसद में कहा कि सरकार ने MSP को किसानों के लिए कम से कम 50% रिटर्न सुनिश्चित करने के लिए तय किया है और सभी कृषि उत्पाद इन दरों पर खरीदे जाएंगे। हालांकि, किसान नेताओं का कहना है कि यह केवल चावल और गेहूं के लिए प्रभावी है。
2. पूर्ण कर्ज माफी
किसान सभी किसानों के लिए पूर्ण कर्ज माफी की मांग कर रहे हैं, विशेषकर 10,000 रुपये से अधिक के कर्ज के लिए, जो कुल मिलाकर 18.4 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। यह मांग कृषि क्षेत्र में बढ़ती ऋणग्रस्तता और किसान आत्महत्याओं की समस्या से जुड़ी है।
"अर्थशास्त्रियों के अनुसार MSP में 1% की वृद्धि से मुद्रास्फीति में 15 आधार बिंदुओं की वृद्धि हो सकती है।"
3. अन्य महत्वपूर्ण मांगें
- पेंशन: किसानों और कृषि मजदूरों के लिए वृद्धावस्था सुरक्षा।
- मनरेगा: प्रति वर्ष 200 दिन रोजगार और 700 रुपये दैनिक मजदूरी।
- WTO से वापसी: मुक्त व्यापार समझौतों पर प्रतिबंध और WTO सदस्यता से वापसी।
चुनौतियां और हकीकत
कार्यान्वयन की चुनौतियां
भंडारण की कमी: भारत का खाद्यान्न उत्पादन 311 मिलियन टन है लेकिन भंडारण क्षमता केवल 145 मिलियन टन है, जिससे 166 मिलियन टन की कमी है।
राजकोषीय बोझ: CRISIL के अनुसार, MSP गारंटी की "वास्तविक लागत" 2023 में लगभग ₹21,000 करोड़ होगी, जबकि कुल कार्यान्वयन अनुमान ₹5 ट्रिलियन तक जाते हैं।
पर्यावरणीय प्रभाव
जल संकट: MSP समर्थित फसलें जैसे धान और गन्ना जल-गहन हैं। पंजाब और हरियाणा ने 2003 से 2020 तक 64.6 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल खो दिया है।
मोनोकल्चर: MSP चावल-गेहूं के मोनोकल्चर को बढ़ावा देता है, जिससे मिट्टी की गुणवत्ता घट रही है।
सरकारी उपलब्धियां (2016-2023)
| क्षेत्र | उपलब्धि |
|---|---|
| आय वृद्धि | 2013-19 में कृषि पारिवारिक आय में 59% की वृद्धि |
| हॉर्टिकल्चर | 352.2 मिलियन टन उत्पादन (खाद्यान्न से अधिक) |
| सिंचाई | ड्रिप सिंचाई से 40-50% पानी की बचत |
| ई-नाम (e-NAM) | ₹80,262 करोड़ का व्यापार |
भविष्य की राह
सफल समाधान के लिए एक व्यापक रणनीति की आवश्यकता है। केवल MSP की कानूनी गारंटी पर्याप्त नहीं होगी। चरणबद्ध सुधार, फसल विविधीकरण (जैसे मोटे अनाज और दालें), और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश आवश्यक है।
सरकार और किसान संगठनों के बीच निरंतर संवाद और सहयोग इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। केवल इस प्रकार के व्यापक सुधार से ही भारतीय कृषि की दीर्घकालिक समस्याओं का समाधान हो सकता है।
कीवर्ड्स: किसान आंदोलन, MSP गारंटी, स्वामीनाथन आयोग, कृषि ऋण माफी, फसल विविधीकरण, शंभू बॉर्डर।
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