मध्य प्रदेश का पन्ना जिला अपनी कीमती रत्नगर्भा भूमि और हीरों के लिए पूरी दुनिया में विशेष पहचान रखता है, लेकिन इन दिनों यहां एक अजीबोगरीब और रोमांचक नजारा देखने को मिल रहा है। पन्ना जिले की विश्रामगंज रेंज के अंतर्गत आने वाले रुंझ डैम के डूब इलाके से गुजरने वाली रुंझ नदी में इन दिनों सैकड़ों और हजारों की संख्या में लोग अपनी किस्मत आजमाने और हीरे तलाशने पहुंच रहे हैं। स्थानीय स्तर पर ऐसी चर्चाएं जोर पकड़ रही थीं कि नदी के उफान और बहाव के साथ बहकर आने वाली 'चाल' (कंकड़-मिट्टी) में हीरे मिल रहे हैं। इस सनसनीखेज खबर के फैलते ही नदी के किनारे लगभग 4 से 5 हजार लोगों ने अपना डेरा डाल लिया था। हालांकि, वन विभाग की लगातार सख्ती और कड़ी कार्रवाई के बाद अब वहां केवल 100 से 150 लोग ही बचे हैं।

दूर-दूर से खिंचे चले आ रहे हैं लोग, उत्तर प्रदेश से मुंबई तक के लोग शामिल

पन्ना की इस हीरा-प्रसिद्ध नदी की ख्याति अब सिर्फ स्थानीय सीमाओं तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसकी गूंज दूर-दूर तक पहुंच चुकी है। स्थिति यह है कि पन्ना के आसपास के इलाकों के अलावा उत्तर प्रदेश के बांदा, बिहार, छतरपुर, अमानगंज, चंदला, लोंडी, बमीठा और यहां तक कि महानगर मुंबई से भी लोग अपनी किस्मत आजमाने के लिए यहां खिंचे चले आ रहे हैं। इस अप्रत्याशित भीड़ में हर उम्र और वर्ग के लोग शामिल हैं, जो किसी भी कीमत पर अपनी गरीबी दूर करने और रातों-रात अमीर बनने की उम्मीद लेकर इस नदी के तट पर डेरा डाले हुए हैं। नदी किनारे लगे इस मजमले ने हर किसी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है, जहां हर शख्स अपनी फूटी किस्मत को चमकाने के लिए कड़ी धूप और मौसम की परवाह किए बिना जुटा हुआ है।

व्यापार में घाटे के बाद पहुंचे रिंकू, तो किसी को वर्षों से बड़ी उम्मीद

इस नदी पर अपनी किस्मत आजमाने पहुंचे चंदनगर के रहने वाले रिंकू कुशवाहा ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि उन्हें हाल ही में अपने फल-सब्जी के व्यापार में भारी वित्तीय नुकसान का सामना करना पड़ा था। इसी नुकसान से उबरने और आजीविका चलाने की उम्मीद में वे पन्ना की इस नदी पर पहुंचे। रिंकू का दावा है कि उन्हें यहां तलाश के दौरान करीब 35 हजार रुपए कीमत का एक छोटा हीरा मिल भी गया है, जिसे बेचने और खरीदने के लिए स्थानीय खरीदारों से उनकी बातचीत चल रही है। रिंकू का मानना है कि हीरा मिलना पूरी तरह से मेहनत और किस्मत का अनूठा खेल है, क्योंकि यहां लोगों को छोटे-छोटे टुकड़ों से लेकर लाखों और करोड़ों रुपए तक के चमकीले हीरे मिलते रहे हैं।

बुजुर्ग महिलाओं से लेकर सालों से भटक रहे लोगों का संघर्ष

सिर्फ युवा ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी इस मुश्किल काम में पीछे नहीं हैं। पन्ना के बेनीसागर मोहल्ले से आईं बुजुर्ग महिला श्यामबाई पिछले तीन-चार सालों से लगातार इस नदी के किनारे आ रही हैं। उनका कहना है कि वे सुबह 10 बजे से आकर पूरे दिन धूप में कड़ी मेहनत करती हैं। उन्हें अब तक छोटे-मोटे पत्थर और टुकड़े तो मिले हैं, लेकिन कोई बड़ा हीरा अभी तक उनके हाथ नहीं लगा है। इसी तरह पन्ना के पुराने पावर हाउस क्षेत्र की रहने वाली पार्वती कोंदर पिछले तीन सालों से लगातार अपनी किस्मत तलाश रही हैं। उन्होंने बताया कि इस चक्कर में उनके 3 से 4 लाख रुपए केवल आने-जाने, रहने और खाने-पीने में खर्च हो चुके हैं, फिर भी वे आगामी दीपावली तक इसी तरह नदी पर खुदाई करती रहेंगी। पार्वती का कहना है कि गरीब तबके के लोगों के लिए यह नदी एक आखिरी उम्मीद बन गई है। मोबाइल पर खबरें देखकर और लोगों की जुबानी किस्से सुनकर वे यहां पहुंची हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि एक दिन उनकी मेहनत जरूर रंग लाएगी।

नदी किनारे बेहद कठिन होती है खुदाई और छनाई की प्रक्रिया

नदी के किनारे सुबह से शाम तक पसीना बहाने वाले लोगों का कहना है कि यहां हीरा खोजना बच्चों का खेल नहीं है, बल्कि यह बेहद थका देने वाली और कठिन प्रक्रिया है। सबसे पहले नदी के बहाव वाले क्षेत्रों से चाल यानी कंकड़-पत्थर और मिट्टी मिश्रित तलहटी की भारी मात्रा में खुदाई की जाती है। इसके बाद उस निकाली गई मिट्टी और पत्थरों को नदी के बहते पानी में तसले यानी बड़ी टोकरी की मदद से लगातार छाना जाता है। छनाई की इस लंबी प्रक्रिया के बाद जब चाल का मलबा कम हो जाता है, तो अंत में बचे हुए बारीक पत्थरों के बीच से अपनी पैनी नजरों से हीरों को चुनना (बीनना) पड़ता है। इस काम में कई-कई दिन और हफ्ते बीत जाते हैं, तब जाकर कहीं जाकर सफलता की कोई धुंधली सी उम्मीद नजर आती है।

वन विभाग की सख्त कार्रवाई, टपरियों को हटाया और सामान जब्त

यह पूरा इलाका विश्रामगंज रेंज के अंतर्गत आता है और आधिकारिक रूप से वन विभाग की भूमि का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में वन क्षेत्र में हो रहे इस अवैध जमावड़े और खनन जैसी गतिविधियों को रोकने के लिए वन विभाग ने अपनी गश्त और पहरा बेहद कड़ा कर दिया है। स्थानीय लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों का यह भी आरोप है कि वन विभाग की टीमें लगातार मौके पर पहुंचकर लोगों की बनाई गई अस्थाई टपरियों (झोपड़ियों) को बुलडोजर या हाथों से हटा रही हैं, और चाल छानने वाले लोहे के तसले तथा कुदाल जैसी जरूरी सामग्री को भी जब्त कर रही हैं। वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा लोगों को सख्ती से खदेड़ा जा रहा है। इस ताबड़तोड़ और कड़ी कार्रवाई के चलते ही नदी के किनारे उमड़ी हजारों लोगों की भीड़ अब काफी हद तक कम हो गई है, हालांकि कुछ लोग अब भी पुलिस और वन कर्मियों की नजरों से बचकर छिप-छिपाकर अपनी किस्मत आजमाने में लगे हुए हैं।

प्रशासन का बड़ा दावा: हीरे मिलने की बात पूरी तरह महज एक अफवाह

इस पूरे मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए डीएफओ (DFO) उत्तर वन मंडल धीरेंद्र प्रताप सिंह ने स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट किया है। उन्होंने कड़े शब्दों में दावा किया है कि यह क्षेत्र जल संसाधन विभाग को ट्रांसफर किया जा चुका है और इस इलाके में नदी के बहाव में हीरे मिलने की बात पूरी तरह से निराधार, असत्य और महज एक अफवाह के अलावा कुछ भी नहीं है। डीएफओ के अनुसार, जैसे ही विभाग को इस भ्रामक बात की सूचना मिली, वन विभाग की विशेष टीम तुरंत मौके पर पहुंची और लोगों को समझाइश दी। अधिकारियों की समझाइश और सख्ती के बाद सभी लोग वहां से अपने घर वापस लौट चुके हैं और वर्तमान में वह क्षेत्र पूरी तरह से खाली हो चुका है। वन विभाग ने आम जनता और दूर-दराज से आने वाले लोगों से जोरदार अपील की है कि वे इस तरह की झूठी और भ्रामक अफवाहों पर बिल्कुल भी ध्यान न दें, क्योंकि प्रकृति के नियमों के तहत किसी भी नदी में इस तरह पानी के साथ बहकर कभी हीरे नहीं आते हैं।

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