पन्ना जिले में मझगाय-रुंझ और केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित होने वाले प्रभावित परिवारों का संघर्ष लगातार गहराता जा रहा है। अपनी न्यायसंगत मांगों को लेकर चल रहा ग्रामीणों का 'चिता आंदोलन' अब अपने 11वें दिन में प्रवेश कर चुका है और इसका रूप और भी अधिक उग्र हो गया है। उचित मुआवजे और सम्मानजनक पुनर्वास की मांग को लेकर सैकड़ों की संख्या में महिलाएं और पुरुष गहरे पानी के अंदर उतर गए हैं। ग्रामीणों ने जल सत्याग्रह करने के साथ-साथ अपने शरीर पर मिट्टी पोतकर प्रशासन की उदासीनता और बेरुखी के खिलाफ कड़ा रोष व्यक्त किया है।

चिता, मिट्टी और फांसी के बाद अब जल सत्याग्रह का नया चरण

यह आंदोलन अपनी मांगों को मनवाने के लिए लगातार नए और कड़े तरीकों को अपना रहा है। इससे पहले ग्रामीणों ने चिता सजाकर, शरीर पर मिट्टी लगाकर और सांकेतिक फांसी जैसे विरोध प्रदर्शन किए हैं, जो अब जल सत्याग्रह के रूप में आगे बढ़ रहा है। केन-बेतवा, रुंझ और ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग परियोजना के दायरे में आने वाले प्रभावित परिवार पिछले कई सालों से अपने घरों और जमीनों से बेदखल होने का भारी दर्द झेल रहे हैं। आंदोलन की अगुवाई कर रहे जय किसान संगठन के प्रमुख नेता अमित भटनागर ने विस्थापितों के इस दयनीय हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि आम नागरिकों के घर, उनके पुस्तैनी गांव और उनकी पूरी जिंदगियां पानी में डूबने की कगार पर पहुंच चुकी हैं, इसके बावजूद जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का रवैया बेहद असंवेदनशील बना हुआ है। विस्थापितों की इस कठिन परिस्थिति की सुध लेने वाला कोई नहीं है, जिसके कारण उन्हें मजबूरन इस तरह के कड़े और जोखिम भरे आंदोलनों का सहारा लेना पड़ रहा है।

सिंचित जमीन को कागजों में असिंचित दर्ज करने का गंभीर आरोप

आंदोलनकारियों ने प्रशासन और संबंधित विभागों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि किसानों की अत्यधिक उपजाऊ और सिंचित जमीनों को जानबूझकर कागजों में असिंचित दर्ज कर दिया गया है, जिससे उन्हें मुआवजे के नाम पर भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, किसानों की खड़ी हुई फसलों पर जबरन जेसीबी चलवाने और निर्माण कार्यों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां करने से ग्रामीणों की रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया भी छिन गया है।

अमित भटनागर ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह केवल कुछ पैसों के मुआवजे की लड़ाई भर नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण, स्थानीय जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के मूल अधिकारों की एक बड़ी लड़ाई है। प्रभावित परिवारों ने एकजुट होकर यह साफ कर दिया है कि जब तक सभी पात्र विस्थापितों को उनकी भूमि का उचित मुआवजा और एक सम्मानजनक जीवन यापन के लिए पुनर्वास पैकेज नहीं मिल जाता, तब तक उनका यह सत्याग्रह किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होगा।

विस्थापितों की प्रमुख मांगें और भविष्य की रणनीति

ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन द्वारा लगातार उनकी अनदेखी की जा रही है, जिससे उनका आक्रोश और अधिक बढ़ रहा है। परियोजना के कारण विस्थापित हो रहे लोगों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। वे चाहते हैं कि सरकार उनकी समस्याओं का त्वरित समाधान करे और उन्हें बसाहट के लिए बेहतर स्थान प्रदान करे। यदि प्रशासन ने जल्द ही कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो इस आंदोलन को और भी अधिक व्यापक स्तर पर ले जाया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

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