मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में एक ऐसी कहानी सामने आई है जो उन युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो कम आय और सीमित संसाधनों के कारण निराश हो जाते हैं। पन्ना जिले की मनोर पंचायत के अंतर्गत आने वाले जरुआपुर गांव के निवासी सुब्रत कुमार मल्लिक ने यह साबित कर दिखाया है कि यदि इच्छाशक्ति और सही तकनीकी मार्गदर्शन हो, तो खेती जैसे पारंपरिक पेशे को भी एक लाभकारी उद्योग में बदला जा सकता है। ₹2500 के मामूली वेतन वाली अतिथि शिक्षक की नौकरी छोड़ने वाले सुब्रत आज सालाना ₹4 से ₹5 लाख तक का मुनाफा कमा रहे हैं।
नौकरी का संघर्ष और खेती का साहसी निर्णय
सुब्रत कुमार मल्लिक साल 2010 से लेकर कोरोना काल तक ग्राम मनोर के प्राथमिक शाला में अतिथि शिक्षक के पद पर कार्यरत थे। उस दौर में उन्हें प्रतिमाह मात्र ₹2500 का मानदेय मिलता था, जिसमें परिवार का भरण-पोषण करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण था। आर्थिक तंगी से जूझते हुए उन्होंने एक साहसी निर्णय लिया और शिक्षण कार्य छोड़कर अपनी 5 एकड़ पुश्तैनी जमीन पर खेती शुरू की।
शुरुआती दो वर्षों तक उन्होंने पारंपरिक तरीके से खेती की, लेकिन परिणाम संतोषजनक नहीं रहे। उन्हें सालाना मात्र ₹1 लाख की ही आय हो रही थी, जो मेहनत और लागत के हिसाब से बेहद कम थी। यहीं से उनके जीवन में बदलाव का मोड़ आया और उन्होंने खेती को आधुनिक दृष्टिकोण से देखने का निश्चय किया।
वैज्ञानिक मार्गदर्शन और आधुनिक तकनीक का समावेश
अपनी खेती को मुनाफे में बदलने के लिए सुब्रत ने पन्ना के उद्यानिकी विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के विशेषज्ञों से संपर्क किया। वरिष्ठ वैज्ञानिक पी.एन. त्रिपाठी, उद्यानिकी विकास अधिकारी पी.के. श्रीवास्तव और संजीत सिंह बागरी के मार्गदर्शन में उन्होंने आधुनिक कृषि तकनीकों का गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया।
सुब्रत ने अपने खेत में सबसे पहले 'ड्रिप इरिगेशन' (टपक सिंचाई) सिस्टम स्थापित किया। इससे पानी की बचत हुई और पौधों को पर्याप्त नमी मिलने से फसलों का विकास बेहतर हुआ। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'इंटरक्रॉपिंग' (सह-फसली खेती) को अपनाया, जिससे एक ही समय में एक ही खेत से कई प्रकार की फसलों का उत्पादन संभव हो सका।
सफलता का मंत्र: ग्राफ्टिंग तकनीक का कमाल
सुब्रत की इस सफलता में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका 'ग्राफ्टिंग' तकनीक की है। उन्होंने एक अनूठा प्रयोग करते हुए स्थानीय जंगली बैंगन, जिसे पन्ना क्षेत्र में 'भटकटइहा' कहा जाता है, की जड़ों का उपयोग किया। यह जंगली पौधा बीमारियों और कठिन से कठिन मौसमी परिस्थितियों को झेलने में सक्षम होता है।
सुब्रत ने इस भटकटइहा की मजबूत जड़ों पर टमाटर के पौधों की ग्राफ्टिंग की। इसके परिणाम आश्चर्यजनक रहे—फसल में बीमारियों का प्रकोप न के बराबर हुआ और उत्पादन की गुणवत्ता व मात्रा में जबरदस्त इजाफा हुआ। आज उनकी यह तकनीक क्षेत्र के अन्य किसानों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
सामाजिक प्रभाव: गांव के लोगों को मिला स्वरोजगार
सुब्रत कुमार मल्लिक की सफलता केवल उनके परिवार तक सीमित नहीं रही है। उन्होंने अपने खेतों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा किए हैं। उनके खेत पर आज 4 से 5 स्थानीय श्रमिक नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं, जिन्हें ₹400 प्रतिदिन का पारिश्रमिक प्राप्त हो रहा है। इस प्रकार, सुब्रत ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी है, बल्कि अपने गांव के अन्य परिवारों के लिए भी आय का साधन विकसित किया है।
निष्कर्ष
आज पन्ना जिले में सुब्रत कुमार मल्लिक का नाम आधुनिक और वैज्ञानिक खेती के पर्याय के रूप में लिया जाता है। उनकी कहानी यह स्पष्ट संदेश देती है कि कृषि क्षेत्र में नवाचार (innovation) और विशेषज्ञों के परामर्श का लाभ उठाकर न केवल मुनाफा कमाया जा सकता है, बल्कि समाज में सम्मानजनक स्थान भी प्राप्त किया जा सकता है। सुब्रत का सफर उन सभी किसानों के लिए एक मार्गदर्शिका है जो अपनी खेती को आधुनिक बनाना चाहते हैं और स्वरोजगार के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करना चाहते हैं।
image source: https://www.bhaskar.com
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