पन्ना: शिक्षा के अधिकार (RTE) कानून के तहत देश के हर बच्चे को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त है, लेकिन पन्ना जिले के शाहनगर क्षेत्र में यह अधिकार कागजों तक ही सीमित नजर आ रहा है। यहाँ पारधी समाज के दर्जनों बच्चे केवल इसलिए स्कूलों और हॉस्टलों से दूर हैं क्योंकि उनके पास जन्म प्रमाण पत्र, [Aadhaar Redacted] कार्ड और समग्र आईडी जैसे अनिवार्य दस्तावेज नहीं हैं। दस्तावेजों की यह कमी इन बच्चों के भविष्य के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।

अभिभावकों की पीड़ा और प्रशासनिक उदासीनता बुधवार को पारधी समाज के ये बच्चे अपने अभिभावकों के साथ अपनी व्यथा लेकर पन्ना कलेक्ट्रेट पहुँचे। बच्चों के माता-पिता का कहना है कि वे अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, लेकिन जरूरी कागजातों की उपलब्धता न होने के कारण सरकारी तंत्र ने उनके बच्चों के लिए स्कूलों के दरवाजे बंद कर दिए हैं। अभिभावकों के अनुसार, उन्होंने इस समस्या को लेकर कई बार स्थानीय प्रशासन और शिक्षा विभाग के अधिकारियों के चक्कर काटे हैं, लेकिन उन्हें हर बार केवल कोरे आश्वासनों के अलावा कुछ हासिल नहीं हुआ।

कानून बनाम जमीनी हकीकत शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) के तहत 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देना सरकार की वैधानिक जिम्मेदारी है। नियम स्पष्ट है कि किसी भी बच्चे को केवल दस्तावेजों की कमी के आधार पर स्कूल में दाखिला देने से मना नहीं किया जा सकता है। इसके बावजूद, प्रशासनिक स्तर पर फाइलों के उलझाव और उदासीनता के कारण ये बच्चे शिक्षा की मुख्यधारा से कटे हुए हैं। यह स्थिति न केवल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाती है, बल्कि उन संवैधानिक वादों की भी पोल खोलती है जो बच्चों को शिक्षित करने के लिए किए गए हैं।

कलेक्टर का हस्तक्षेप और समाधान की उम्मीद मामले की गंभीरता को देखते हुए पन्ना कलेक्टर ऊषा परमार ने तत्काल संज्ञान लिया है। कलेक्टर ने संबंधित विभाग के अधिकारियों को इन बच्चों के दस्तावेज प्राथमिकता के आधार पर बनवाने के कड़े निर्देश जारी किए हैं।

इस विषय पर जानकारी देते हुए डीपीसी (DPC) किरण कौशिक ने बताया कि:

  • प्रशासन द्वारा एक विशेष अभियान के तहत बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र और अन्य आवश्यक पहचान पत्रों को तैयार किया जाएगा।

  • दस्तावेज पूरी तरह तैयार होते ही सभी बच्चों को स्कूलों और हॉस्टलों में दाखिला सुनिश्चित किया जाएगा।

  • अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की देरी न हो ताकि बच्चों का शैक्षणिक सत्र खराब न हो।

निष्कर्ष पन्ना जिले का यह मामला इस बात का प्रतीक है कि दूरस्थ और वंचित समाज के लोगों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना आज भी एक बड़ी चुनौती है। कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद अब इन बच्चों को शिक्षा मिलने की उम्मीद जगी है। हालांकि, सवाल यह है कि आखिर क्यों इन बच्चों को अपने अधिकार के लिए कलेक्ट्रेट तक दौड़ लगानी पड़ी? अब देखना यह है कि प्रशासन कब तक इन बच्चों के हाथ में स्कूल की किताबें पहुँचा पाता है।

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