पन्ना: मध्य प्रदेश का पन्ना जिला इन दिनों एक गंभीर और भावुक संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। जिले की विभिन्न विकास परियोजनाओं—जिनमें बहुचर्चित केन-बेतवा लिंक परियोजना, मझगांय, रूंझ, नेगुवा और एनटीपीसी परियोजनाएं शामिल हैं—से विस्थापित हुए हजारों आदिवासी और किसान अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए सड़क से हटकर अब सीधे उफनती नदी के जल में उतर आए हैं। लगातार छठे दिन भी ये प्रदर्शनकारी कमर तक गहरे पानी में खड़े होकर 'जल सत्याग्रह' कर रहे हैं। इनका स्पष्ट कहना है कि या तो सरकार उन्हें सम्मानजनक पुनर्वास और न्याय दे, अन्यथा वे इसी उफनती नदी में जल समाधि लेने को मजबूर होंगे।

'चिता आंदोलन' और प्रदर्शन का भयावह स्वरूप पन्ना जिले में चल रहा यह प्रदर्शन किसी साधारण धरने जैसा नहीं है, बल्कि यह एक 'चिता आंदोलन' का रूप ले चुका है। कड़ाके की बारिश और नदी के बढ़ते जलस्तर के बावजूद आंदोलनकारी अडिग हैं। पानी के बीच खड़े होकर प्रदर्शनकारी 'अभी तो ये अंगड़ाई है, आगे और लड़ाई है' जैसे गगनभेदी नारे लगाकर प्रशासन को अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर और जय किसान संगठन ने इसे एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा कर दिया है। प्रदर्शनकारियों का जज्बा इतना प्रबल है कि महिलाएं लकड़ी पर लेटकर और ग्रामीण गले तक पानी में खड़े होकर विरोध प्रदर्शन का हिस्सा बन रहे हैं।

प्रशासनिक व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल आंदोलनकारियों ने जिला प्रशासन पर दमनकारी रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि प्रशासन ने आंदोलन स्थल पर बुनियादी सुविधाओं, विशेषकर पीने के साफ पानी की व्यवस्था को पूरी तरह ठप कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप, भीषण गर्मी और उमस के बीच महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग नदी का मटमैला और दूषित पानी पीने के लिए विवश हैं। ग्रामीणों का दावा है कि इस प्रदूषित पानी के सेवन से कई लोगों की तबीयत बिगड़ रही है, लेकिन प्रशासन इस मानवीय त्रासदी के प्रति पूरी तरह उदासीन बना हुआ है।

हाल ही में, बिजावर तहसीलदार अभिनय शर्मा, सटई तहसीलदार इंद्र कुमार गौतम और किशनगढ़ थाना प्रभारी कमलजीत सिंह मवई के नेतृत्व में एक प्रशासनिक दल पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँचा था। हालांकि, प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि ये अधिकारी उनकी समस्याओं के समाधान के लिए नहीं, बल्कि उन्हें डराने-धमकाने आए थे। ग्रामीणों ने अधिकारियों पर सीधे भ्रष्टाचार और विस्थापितों के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाया है। हालांकि, प्रशासन की ओर से इन गंभीर आरोपों पर अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया या जवाब नहीं आया है।

सरकार का विशेष पुनर्वास पैकेज और उसका गणित इस पूरे विवाद के बीच, राज्य सरकार ने विस्थापितों के लिए एक विशेष पुनर्वास पैकेज की घोषणा की है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने इस पैकेज की जानकारी देते हुए इसे विस्थापितों के लिए राहत भरा कदम बताया है। सरकार के इस दावे के अनुसार:

  • पात्रता और अनुदान: पात्र परिवारों को प्रति परिवार ₹12.50 लाख तक का एकमुश्त पुनर्वास अनुदान देने का प्रावधान किया गया है।

  • विकल्प की स्वतंत्रता: जो विस्थापित परिवार शासकीय भूखंड लेने के इच्छुक नहीं हैं, उन्हें ₹12.50 लाख की नकद राशि दी जाएगी।

  • भूखंड विकल्प: यदि कोई विस्थापित शहरी क्षेत्र में भूखंड लेना चाहता है, तो उसे ₹6.50 लाख और ग्रामीण क्षेत्र में भूखंड लेने पर ₹7 लाख का अतिरिक्त अनुदान मिलेगा।

  • पंजीयन शुल्क: शासन ने यह भी घोषणा की है कि विस्थापितों को मिलने वाले भूखंडों की रजिस्ट्री पर लगने वाला स्टाम्प और पंजीयन शुल्क पूरी तरह से सरकार वहन करेगी।

विस्तृत लाभ का विवरण विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह के आंकड़ों के अनुसार, इस पैकेज से 2,500 से अधिक परिवारों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद है। इसका विभाजन इस प्रकार है:

  1. मझगांय परियोजना: इस परियोजना के अंतर्गत 1,450 परिवारों को लगभग ₹181 करोड़ की राशि आवंटित की गई है।

  2. रूंझ परियोजना: इस परियोजना के 730 परिवारों के लिए ₹91.25 करोड़ का बजट रखा गया है।

  3. केन-बेतवा लिंक परियोजना: पन्ना जिले के 313 विस्थापित परिवारों को भी इस विशेष पैकेज का लाभ मिलेगा।

समाधान क्यों नहीं हो पा रहा? पैकेज की इतनी बड़ी घोषणा के बावजूद प्रदर्शनकारी संतुष्ट नहीं हैं। उनका तर्क है कि समस्या केवल नकद राशि या पैकेज तक सीमित नहीं है। आंदोलनकारियों का कहना है कि सरकार के वादे और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। उनके अनुसार, जब तक सभी वास्तविक विस्थापितों की पहचान पारदर्शी तरीके से नहीं होती और उन्हें उनके अधिकारों के साथ पूर्ण पुनर्वास नहीं मिल जाता, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी।

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि वे केवल कागजी घोषणाओं से रुकने वाले नहीं हैं। उनकी मांग है कि पुनर्वास की प्रक्रिया मानवीय आधार पर हो, न कि केवल सरकारी फाइलों के माध्यम से। उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि आठ दिनों के भीतर उनकी सभी मांगों पर ठोस और सकारात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो वे अपने अगले कदम यानी 'जल समाधि' की ओर बढ़ने को तैयार हैं।

भविष्य की चुनौती और निष्कर्ष पन्ना जिले में केन-बेतवा और अन्य परियोजनाओं के विस्थापितों का यह संघर्ष विकास और विस्थापन के बीच के उस गहरे द्वंद को दर्शाता है, जो देश के कई हिस्सों में आज भी अनसुलझा है। एक तरफ सरकार बड़े स्तर पर विकास परियोजनाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए अनिवार्य मानती है, तो दूसरी तरफ उन लोगों का दर्द है जिन्होंने अपना घर, खेत और अपनी जड़ों को इन परियोजनाओं के लिए त्याग दिया है।

फिलहाल, पन्ना का यह 'जल सत्याग्रह' प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। न तो प्रदर्शनकारी पीछे हटने को तैयार हैं और न ही प्रशासन की ओर से अब तक कोई ऐसी आधिकारिक घोषणा की गई है जिससे आंदोलन का कोई सार्थक समाधान निकलता दिखे। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार प्रदर्शनकारियों की भावनाओं और उनकी पीड़ा को समझते हुए कोई बीच का रास्ता निकालेगी, या यह आंदोलन किसी बड़ी अनहोनी की ओर बढ़ेगा। पन्ना की उफनती नदी आज केवल पानी नहीं, बल्कि उन हजारों लोगों का धैर्य भी बहा ले जाने को आतुर दिख रही है।

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