पन्ना: अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत (ABGP) ने देश में अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) निर्धारण की मौजूदा व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े किए हैं। संगठन ने केंद्र सरकार से मांग की है कि एमआरपी के नाम पर देश के आम उपभोक्ताओं के साथ हो रहे बड़े पैमाने पर आर्थिक शोषण को तुरंत रोका जाए और इसके लिए एक बेहद सख्त व पारदर्शी कानून बनाया जाए। इस गंभीर विषय को लेकर अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने पन्ना जिला कलेक्टर को प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है।
इस ज्ञापन में विशेष रूप से मेडिकल सेक्टर यानी चिकित्सा और दवा उद्योग में चल रही कथित धांधली और भारी मुनाफाखोरी के कई चौंकाने वाले और आंखें खोल देने वाले उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं। संगठन का सीधा आरोप है कि बड़ी-बड़ी कंपनियाँ, अस्पताल और व्यापारी मिलकर एमआरपी की आड़ में आम नागरिकों की जेब पर डाका डाल रहे हैं, जिसके कारण गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। पन्ना जिले के नागरिकों को भी इस अनियंत्रित मूल्य निर्धारण के कारण भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
चिकित्सा और दवा क्षेत्र में मुनाफाखोरी के चौंकाने वाले उदाहरण
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के वरिष्ठ पदाधिकारी भूपेंद्र सिंह परमार ने चिकित्सा क्षेत्र में एमआरपी के खेल को उजागर करते हुए कई गंभीर और तथ्यात्मक उदाहरण जिला प्रशासन के सामने रखे। उन्होंने बताया कि किस तरह जीवन रक्षक उपकरणों और दवाओं के दामों को कृत्रिम रूप से बढ़ाकर उपभोक्ताओं को लूटा जा रहा है:
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पेसमेकर का खेल: हृदय रोगियों के लिए जीवन रक्षक माना जाने वाला पेसमेकर, जिसे कंपनियां मात्र ₹25,000 की लागत में आयात (Import) करती हैं, उसकी एमआरपी (MRP) बाजार में ₹2 लाख तक अंकित की जा रही है।
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हार्ट वाल्व में भारी अंतर: इसी तरह, दिल की गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाले हार्ट वाल्व, जिसकी वास्तविक कीमत या आयात लागत लगभग ₹4 लाख होती है, उसे मरीजों को ₹26 लाख तक की भारी-भरकम एमआरपी पर बेचा जा रहा है।
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दवाइयों पर 100 गुना दाम: आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली कई आवश्यक दवाओं पर उनकी वास्तविक उत्पादन लागत (Production Cost) से 100 गुना अधिक तक एमआरपी छाप दी जाती है।
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मेडिकल सुई (सिरिंज) का गणित: अस्पताल और मेडिकल स्टोर्स में इस्तेमाल होने वाली एक सामान्य सुई, जिसकी वास्तविक उत्पादन लागत मात्र ₹3 होती है, उस पर भी ₹30 का मूल्य टैग (Price Tag) लगा दिया जाता है, जो कि लागत का सीधा 10 गुना है।
जानबूझकर एमआरपी बढ़ाने के पीछे का कॉर्पोरेट मनोविज्ञान
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के विश्लेषण के अनुसार, कंपनियां और बड़े कॉर्पोरेट घराने यह अत्यधिक एमआरपी किसी गलती से नहीं, बल्कि एक सोची-समझी व्यावसायिक रणनीति और मार्केटिंग टूल के तहत जानबूझकर प्रिंट करते हैं। इसके पीछे का मुख्य मकसद उपभोक्ताओं के मनोविज्ञान के साथ खेलना है:
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'भारी छूट' का छलावा: कंपनियाँ जानबूझकर एमआरपी को आसमान पर रखती हैं ताकि वे ग्राहकों को 50% से लेकर 80% तक का 'भारी डिस्काउंट' या छूट दिखा सकें।
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बचत का झूठा अहसास: इस भारी छूट को देखकर आम ग्राहक भ्रमित हो जाता है। उसे यह झूठा अहसास होता है कि उसने खरीदारी के दौरान बहुत बड़ी बचत की है, जबकि हकीकत में वह ठगा जा रहा होता है।
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छूट के बाद भी मोटा मुनाफा: 'सेल', 'ऑफर' और 'बंपर डिस्काउंट' देने के बाद भी कंपनियाँ और डीलर वस्तु की वास्तविक लागत से कई गुना अधिक मुनाफा कमा रहे होते हैं।
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मॉल और ऑनलाइन शॉपिंग में भी यही जाल: संगठन ने स्पष्ट किया कि यह केवल दवाओं या अस्पतालों तक सीमित नहीं है। मुनाफाखोरी की यह प्रवृत्ति आज के समय में ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स, बड़े-बड़े मॉल्स और रिटेल चेन में भी धड़ल्ले से देखी जा रही है।
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की प्रमुख मांगें
उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा और बाजार में पारदर्शिता लाने के लिए संगठन ने सरकार के सामने निम्नलिखित बिंदुवार मांगें रखी हैं:
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उत्पादन लागत और फर्स्ट सेल प्राइस अनिवार्य हो: सरकार ऐसा नियम बनाए जिसके तहत हर उत्पाद के पैकेट पर उसकी वास्तविक 'उत्पादन लागत' (Production Cost) और 'फर्स्ट सेल प्राइस' (First Sale Price - जिस दाम पर कंपनी पहली बार डीलर को माल बेचती है) को छापना कानूनी रूप से अनिवार्य किया जाए।
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स्वतंत्र प्राधिकरण का गठन: अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) की निगरानी करने, उसके नियम तय करने और समय-समय पर उसकी समीक्षा करने के लिए देश में एक पूर्णतः स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण (Regulatory Authority) या बोर्ड का गठन किया जाए।
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भारी जुर्माने और सजा का प्रावधान: जो भी कंपनियाँ, निर्माता या अस्पताल एमआरपी के नियमों का उल्लंघन करते पाए जाएं या अनुचित लाभ कमाते पाए जाएं, उनके खिलाफ भारी आर्थिक जुर्माने और सख्त कानूनी सजा का प्रावधान कानून में होना चाहिए।
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पारदर्शिता के लिए कड़े नियम: लागत मूल्य और अंतिम बिक्री मूल्य के बीच के अंतर को नियंत्रित करने के लिए एक निश्चित प्रतिशत (Margin) तय किया जाए, जिससे कोई भी कंपनी मनमाना मुनाफा न वसूल सके।
एमआरपी अब उपभोक्ता संरक्षण नहीं, मुनाफाखोरी का हथियार
संगठन के एक अन्य पदाधिकारी मलखान सिंह ने इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए जोर दिया कि जिस 'अधिकतम खुदरा मूल्य' (MRP) की अवधारणा को कभी उपभोक्ताओं को जमाखोरी और ओवर-प्राइसिंग से बचाने के लिए एक 'सुरक्षा कवच' के रूप में पेश किया गया था, वह आज पूरी तरह बदल चुका है।
वर्तमान समय में एमआरपी उपभोक्ता संरक्षण का जरिया न रहकर, बल्कि कॉर्पोरेट कंपनियों और बिचौलियों के लिए विपणन (Marketing) और असीमित मुनाफ़ाखोरी का एक वैध उपकरण (Tool) बन चुका है। उन्होंने अत्यंत कड़े शब्दों में कहा कि जब तक देश के भीतर किसी भी वस्तु के लागत मूल्य और उसकी अंतिम बिक्री मूल्य के बीच पूर्ण पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक पन्ना सहित देश के आम आदमी और गरीब मरीजों का यह आर्थिक शोषण इसी तरह निर्बाध रूप से जारी रहेगा। सरकार को जनहित में तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
मुख्य बातें
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| संगठन का नाम | अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत (ABGP) |
| मुख्य मांग | MRP निर्धारण के लिए सख्त कानून और स्वतंत्र बोर्ड का गठन |
| लक्षित क्षेत्र | मुख्य रूप से मेडिकल सेक्टर (दवाएं और चिकित्सा उपकरण), मॉल्स और ऑनलाइन शॉपिंग |
| पेसमेकर की लागत बनाम MRP | लागत ₹25,000 |
| हार्ट वाल्व की लागत बनाम MRP | लागत ₹4 लाख |
| सुई (सिरिंज) की लागत बनाम MRP | लागत ₹3 |
| मुख्य आरोप | 80% तक का भ्रामक डिस्काउंट दिखाकर 100 गुना तक मुनाफाखोरी करना |
image source : https://www.bhaskar.com
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