मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के विकासखंड अंतर्गत संचालित हो रही 'अहिरगवां माइनर नहर' परियोजना इन दिनों विवादों के केंद्र में है। एक तरफ जहाँ सरकारी अधिकारी इस नहर को क्षेत्र की प्रगति और सिंचाई सुविधाओं के विस्तार का माध्यम बता रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय किसान इसे अपने अस्तित्व के लिए खतरा और सरकारी तंत्र की बड़ी लापरवाही मान रहे हैं। सोमवार को किसानों का यह गुस्सा सड़क पर उतर आया, जब उन्होंने जल संसाधन विभाग और ठेकेदार की मनमानी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। किसानों का आरोप है कि उनकी उपजाऊ जमीन को जबरन कब्जाया जा रहा है और उन्हें मुआवजे के नाम पर छलावा दिया जा रहा है।

जमीन का दोगुना अधिग्रहण, मुआवजा आधा: किसानों का दर्द

प्रभावित किसान अवध बिहारी पाठक और अन्य ग्रामीणों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए बताया कि नहर निर्माण के लिए प्रशासन और ठेकेदार की जुगलबंदी के चलते किसानों की जमीनें हड़पी जा रही हैं। किसानों का स्पष्ट कहना है कि मौके पर लगभग 20 मीटर चौड़ी नहर बनाई जा रही है, जिसके लिए उनकी कुल 17 आरे जमीन का उपयोग किया जा रहा है। विडंबना यह है कि विभाग द्वारा रिकॉर्ड में महज 8 आरे जमीन का अधिग्रहण दिखाया जा रहा है और मुआवजा भी उसी के आधार पर तय किया गया है।

किसानों के लिए यह आर्थिक चोट के समान है। उनकी मेहनत से तैयार की गई उपजाऊ भूमि का आधा हिस्सा बिना किसी उचित मुआवजे के नहर में तब्दील कर दिया गया है। इसके साथ ही नहर की खुदाई से निकलने वाली मिट्टी को पास के ही सिंचित खेतों में मनमाने तरीके से डाल दिया गया है, जिससे मिट्टी की उपजाऊ परत दब गई है और आने वाली फसलों के लिए जमीन बंजर होने का खतरा पैदा हो गया है।

9 साल पुरानी दर: 2026 में 2016 की गणना का खेल

इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू मुआवजे की दर है। राम चरण, किशन गौंड और अजय विश्वकर्मा जैसे पीड़ित किसानों का कहना है कि आज हम वर्ष 2026 में खड़े हैं, महंगाई और जमीन की कीमतों में आसमान-जमीन का अंतर आ चुका है, लेकिन जल संसाधन विभाग आज भी 9 साल पुरानी यानी वर्ष 2016 की दरों पर मुआवजा बांट रहा है। यह न केवल अनुचित है, बल्कि कानूनन भी किसानों के अधिकारों का हनन है।

यही नहीं, कागजों में हेरफेर करने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। कई किसानों की सिंचित भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में 'असिंचित' (सूखी) दर्ज कर दिया गया है, ताकि उन्हें मिलने वाली मुआवजे की राशि को कम किया जा सके। किसानों का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया सोची-समझी साजिश के तहत की गई है, ताकि ठेकेदार और संबंधित अधिकारियों को अनुचित लाभ पहुँचाया जा सके और किसानों को उनके वाजिब हक से वंचित रखा जाए।

40 प्रतिशत किसान अब भी मुआवजे के इंतजार में

देवीदीन कुशवाहा ने एक और कड़वा सच उजागर किया है। उन्होंने बताया कि लगभग 30 से 40 प्रतिशत किसान ऐसे हैं, जिन्हें निर्माण कार्य शुरू होने के बाद भी मुआवजे की एक भी किश्त नहीं मिली है। विभाग ने निर्माण तो शुरू कर दिया, लेकिन किसानों के खातों में पैसे भेजने की कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई। स्थिति यह है कि कई छोटे और गरीब किसानों के खेत नहर के बीचों-बीच आने के कारण दो टुकड़ों में बंट गए हैं।

खेत का दो भागों में बंटना किसान के लिए सबसे बड़ी त्रासदी है, क्योंकि इससे खेती की मशीनरी ले जाना मुश्किल हो गया है और बची हुई भूमि पर खेती करना एक जटिल चुनौती बन गई है। ऐसे किसानों को न तो कोई सुरक्षित रास्ता दिया गया है और न ही उन टुकड़ों के लिए कोई अतिरिक्त मुआवजा प्रदान किया गया है, जिससे उनकी रोजी-रोटी पर संकट मंडरा रहा है।

किसानों की ठोस मांगें: वर्तमान दर और सुरक्षा

क्षेत्र के किसानों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो वे अपना आंदोलन उग्र करेंगे। उनकी प्रमुख मांगें निम्नलिखित हैं:

  • मुआवजा दर का पुनर्निधारण: मुआवजे की गणना वर्ष 2016 की पुरानी दर के स्थान पर वर्तमान वर्ष 2026 की बाजार दरों के आधार पर की जाए।

  • भूमि मापन में सुधार: नहर निर्माण के लिए अधिग्रहित की गई वास्तविक जमीन (17 आरे) का ही भुगतान किया जाए, न कि 8 आरे का।

  • मिट्टी की भरपाई: खेतों में फेंकी गई खुदाई की मिट्टी को हटवाया जाए और यदि इससे फसल का नुकसान हुआ है, तो उसका मुआवजा दिया जाए।

  • सुरक्षा व रास्ता: जिन किसानों के खेत दो भागों में बंट गए हैं, उन्हें नहर पार करने के लिए उचित पुलिया या सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराए जाएं।

  • तत्काल भुगतान: जिन किसानों को अभी तक मुआवजे की राशि नहीं मिली है, उनके दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी कर तुरंत भुगतान सुनिश्चित हो।

जल संसाधन विभाग का तर्क: प्रक्रिया का बचाव

दूसरी ओर, इस पूरे मामले पर जल संसाधन विभाग के सब इंजीनियर नवदीप रमगढिया ने अपनी सफाई दी है। उन्होंने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि निर्माण कार्य निर्धारित डिजाइन और नियमानुसार ही चल रहा है। उन्होंने दावा किया कि 60 से 70 प्रतिशत हितग्राहियों को मुआवजे की राशि उनके खातों में अंतरित की जा चुकी है।

अधिकारी ने कहा कि जिन किसानों को मुआवजा नहीं मिला है, वे मुख्य रूप से 'सह-खातेदार' हैं। उनके मामले में कानूनी दस्तावेजों का अभाव है और जब तक आवश्यक दस्तावेज (जैसे बंटवारा नामा या वारिसान प्रमाण पत्र) जमा नहीं होते, तब तक राशि जारी करना संभव नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे की प्रक्रिया वरिष्ठ अधिकारियों और जिला प्रशासन के स्तर पर तय की गई है, जिसमें विभाग का दखल सीमित है।

निष्कर्ष: प्रशासन बनाम किसान की जंग

पन्ना जिले के अहिरगवां में चल रहा यह विवाद स्पष्ट करता है कि सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में पारदर्शिता और संवेदनशीलता की कितनी कमी है। भले ही नहर क्षेत्र के लिए विकास की दृष्टि से अनिवार्य हो, लेकिन यह विकास किसानों की कीमत पर नहीं होना चाहिए। किसानों के आक्रोश को नजरअंदाज करना न केवल उनके साथ अन्याय है, बल्कि यह भविष्य में किसी भी विकास कार्य के प्रति जनता के भरोसे को कमजोर करने वाला कदम है।

अब पन्ना जिला प्रशासन को इस मामले में हस्तक्षेप कर किसानों और विभाग के बीच के इस विवाद को सुलझाना चाहिए। यदि कागजों में गलती हुई है, तो उसे सुधारना प्रशासन की जिम्मेदारी है। समय रहते यदि उचित मुआवजा और सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह नहर विकास की धारा बहाने के बजाय क्षेत्र में असंतोष का कारण बन जाएगी। पन्ना के किसानों को आज केवल न्याय और उनके अधिकारों का उचित मूल्य चाहिए, जो उन्हें सरकारी फाइलों और फाइलों के पीछे छिपे अधिकारियों से अपेक्षित है।

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