सतना (मध्य प्रदेश): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में सतना की पावन धरा पर एक गरिमामय जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य समाज को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना और भविष्य के भारत के निर्माण में नागरिक कर्तव्यों की भूमिका को रेखांकित करना था। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य श्री भय्याजी जोशी ने अपने उद्बोधन में भारत की आत्मा, सामाजिक मूल्यों और वैश्विक नेतृत्व की संभावनाओं पर अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली विश्लेषण प्रस्तुत किया।
प्रस्तुत है उस महत्वपूर्ण गोष्ठी और भय्याजी जोशी के संबोधन पर आधारित एक विस्तृत समाचार रिपोर्ट:
1. भारत की आत्मा: "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय"
गोष्ठी को संबोधित करते हुए भय्याजी जोशी ने कहा कि विश्व के अन्य देशों और भारत के चिंतन में एक बुनियादी अंतर है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की आत्मा "सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय" (सबके हित और सबके सुख) के शाश्वत सिद्धांत में निहित है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय समाज की वैश्विक पहचान उसकी आर्थिक शक्ति या सैन्य क्षमता से कहीं अधिक उसके उच्च नैतिक मूल्यों, समरसता और मानवता की भावना से होती है। उनके अनुसार, यह विचार केवल नारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे समाज के प्रत्येक व्यक्ति के आचरण में उतरना चाहिए। आज के दौर में, जब दुनिया वैचारिक संघर्षों से जूझ रही है, भारत की इस समावेशी संस्कृति को बनाए रखना और इसे जीवंत रखना सबसे बड़ी आवश्यकता है।
2. समय का परिवर्तन और शाश्वत मूल्यों की स्थिरता
भय्याजी जोशी ने एक बहुत ही व्यावहारिक पक्ष रखते हुए कहा कि समय की गति के साथ परिस्थितियाँ, तकनीक और जीवनशैली का बदलना स्वाभाविक है। लेकिन, उन्होंने समाज को आगाह किया कि कुछ 'मूल मूल्य' ऐसे होते हैं जो कभी नहीं बदलने चाहिए।
अटल जीवन मूल्य:
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सत्य और विश्वास: समाज की नींव आपसी भरोसे पर टिकी होती है।
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समरसता: ऊंच-नीच के भेदभाव से परे एक सूत्र में बंधा समाज।
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कर्तव्यनिष्ठा: अपने कार्य के प्रति समर्पण।
उन्होंने तर्क दिया कि यदि समाज भौतिक प्रगति तो करता है लेकिन इन मूल्यों से दूर हो जाता है, तो वहाँ असुरक्षा, भय और मानसिक असंतुलन की भावना बढ़ने लगती है। इसलिए, परिवर्तन के इस दौर में अपनी जड़ों को थामे रखना अनिवार्य है।
3. अधिकार बनाम कर्तव्य: विश्वगुरु की ओर बढ़ते कदम
अक्सर चर्चा होती है कि भारत पुनः 'विश्वगुरु' कैसे बनेगा? इस प्रश्न का समाधान देते हुए भय्याजी जोशी ने 'कर्तव्य-बोध' का मंत्र दिया। उन्होंने कहा कि भारत में विश्व का मार्गदर्शन करने की क्षमता है, लेकिन इसके लिए समाज को अपने अधिकारों से अधिक अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
उन्होंने एक अत्यंत मार्मिक उदाहरण देते हुए समझाया कि परिवार और समाज में हर व्यक्ति की एक विशिष्ट भूमिका होती है। उदाहरण के तौर पर, बच्चों का पालन-पोषण करना माता-पिता के लिए केवल एक अधिकार नहीं है कि वे उन्हें अपनी इच्छा अनुसार ढालें, बल्कि यह समाज और राष्ट्र के प्रति एक पवित्र जिम्मेदारी भी है। जब हम हर कार्य को अपनी 'जिम्मेदारी' समझकर करते हैं, तभी एक संस्कारित पीढ़ी का निर्माण होता है।
4. सामाजिक कुरीतियाँ और नैतिक मूल्यों का गिरता स्तर
वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर चिंता व्यक्त करते हुए भय्याजी जोशी ने नैतिक मूल्यों के गिरते स्तर और समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज भी समाज के कुछ हिस्सों में असमानता और सामाजिक बुराइयां देखने को मिलती हैं, जो "सर्वजन हिताय" की भावना के विपरीत हैं।
जागरूकता और सामूहिक प्रयास: उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून और संविधान सभी को समान अधिकार प्रदान करते हैं, जो कि अनिवार्य है। लेकिन समाज में वास्तविक समानता केवल कानूनों से नहीं आ सकती। इसके लिए समाज के भीतर एक-दूसरे के प्रति 'सम्मान का भाव' होना जरूरी है। उन्होंने आह्वान किया कि सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने के लिए किसी बाहरी शक्ति की प्रतीक्षा करने के बजाय, समाज को स्वयं जागरूक होना होगा और सामूहिक प्रयास करने होंगे।
5. संस्कृति, प्रकृति और वैश्विक मार्गदर्शन
भारतीय संस्कृति को केवल मानव-केंद्रित न बताते हुए उन्होंने इसे 'प्रकृति-केंद्रित' बताया। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति हमेशा से मानव कल्याण के साथ-साथ प्रकृति संरक्षण की पक्षधर रही है।
प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व: भय्याजी जोशी के अनुसार, प्रकृति का दोहन नहीं बल्कि उसका पोषण हमारा स्वभाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों को समझे और समाज तथा प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाए, तो भारत न केवल एक सशक्त और समृद्ध राष्ट्र बनेगा, बल्कि दुनिया के लिए एक ऐसा मार्गदर्शक (टॉर्चबियरर) सिद्ध होगा, जिसकी खोज आज पूरी मानवता कर रही है।
निष्कर्ष: सशक्त राष्ट्र निर्माण का संकल्प
सतना में आयोजित इस गोष्ठी का संदेश स्पष्ट था—राष्ट्र का उत्थान केवल सरकारों या संस्थाओं के भरोसे नहीं हो सकता। यह तभी संभव है जब समाज का अंतिम व्यक्ति अपनी भूमिका को पहचाने। भय्याजी जोशी के संबोधन ने श्रोताओं को यह सोचने पर मजबूर किया कि "भारत की शक्ति उसकी एकता और उसके मूल्यों में है।"
यदि हम अधिकारों की मांग के साथ-साथ कर्तव्यों का पालन करें, समरसता को जीवन का हिस्सा बनाएं और प्रकृति का सम्मान करें, तो संघ के शताब्दी वर्ष में यह संकल्प भारत को वास्तविक 'परम वैभव' की ओर ले जाने वाला सिद्ध होगा।
रिपोर्ट सारांश:
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आयोजन: संघ शताब्दी वर्ष निमित्त जन गोष्ठी।
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स्थान: सतना, मध्य प्रदेश।
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मुख्य वक्ता: भय्याजी जोशी (अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य, RSS)।
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मुख्य विचार: कर्तव्यों का पालन, सामाजिक समरसता, प्रकृति संरक्षण और शाश्वत मूल्यों की रक्षा।
picture source:https://www.rss.org

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